कोरबा. जिले में पुलिसिंग व्यवस्था को चुस्त करने के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन तमाम दावे धोथे ही हैं। इसकी बानगी उपनगरीय व ग्रामीण क्षेत्र के थानों में देखी जा सकती है, जहां प्रभारी के दायित्व का निर्वहन सहायक उपनिरीक्षक अथवा उपनिरीक्षक कर रहे हैं। धानों में कई ऐसे गंभीर मामले सामने आते हैं, जिसमें निरीक्षक के अभाव में फरियादियों में न्याय मिलने की उम्मीदें खत्म हो जाती है। वे शिकवा शिकायत लेकर जिला मुख्यालय का चक्कर काटने मजबूर हो जाते हैं।
जिले में बांगो कटघोरा, लेमरू, श्यांग, करतला सहित 8 ऐसे धाने हैं जो ग्रामीण क्षेत्र में स्थित है। इन क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को दुरूस्त रखने तबादला सूची जारी किए जाते हैं। कई ऐसे पुलिस कर्मी है जो ग्रामीण क्षेत्र में तबादला होते ही निरस्त कराने की जुगत में लग जाते हैं। वे किसी न किसी तरह स्थानांतरण को रोकने में सफल भी हो जाते हैं। जिससे ग्रामीण थाने में बल की कमी बनी हुई है।

*दो पुलिस कर्मी के भरोसे अस्पताल चौकी*
मेडिकल कालेज प्रबंधन ने जिला अस्पताल को अधिग्रहित कर लिया है। यहां प्रतिदिन औसतन 600 मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं। यहां सड़क हादसा अथवा किसी अन्य घटना में मौत के बाद मृतक के शव को लाया जाता है। अस्पताल परिसर में घटने वाली अपराधिक घटनाओं को सुलझाने सिविल लाइन पुलिस है, लेकिन मर्ग सहित अन्य समस्याओं के निराकरण के लिए अस्पताल चौकी में महज एक प्रधान आरक्षक व एक आरक्षक तैनात है, हालांकि मदद के लिए दो सैनिकों की तैनाती की गई है।
अविभाजित मध्यप्रदेश में 25 मई 1998 को कोरबा जिला अस्तित्व में आया। इस दौरान कोरबा जिले में गिनती के थाना, चौकी थे। जहां तैनात अफसर व जवान विभागीय कामकाज के साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था के लिए मुस्तैद रहते थे। जिला गठन के बाद अपराधों का ग्राफ तेजी से बढ़ता गया। जिसकी रोकथाम के लिए न सिर्फ थाना चौकियों की संख्या में बढ़ोतरी की गई, बल्कि पुलिस कोआधुनिक सुविधा और संसाधन भी मुहैया कराया गया। वर्तमान में 16 थाना के अलावा आधे दर्जन से अधिक पुलिस चौकी व सहायता केन्द्र स्थापित हैं। जहां फरियादी अपनी फरियाद लेकर पहुंचते हैं। उन्हें थाना चौकियों में तैनात अफसरों से त्वरित कार्रवाई की उम्मीद रहती है। कई भार फरियादियों को निराश होकर ही लौटना पड़ता है। जिसे लेकर व्यवस्था में सुधार के नाम पर अफसर व जवानों के तबादले किए जाते हैं। इसकी वजह पुलिसिंग व्यवस्था में कसावट को बताई जाती है, लेकिन जिले के उपनगरीय व ग्रामीण अंचल के दीपका बालको, करतला, लेमरू व श्यांग पांच थाने ऐसे हैं जहां पुलिसिंग व्यवस्था की जिम्मेदारी सहायक उपनिरीक्षक व उपनिरीक्षक रैंक के अधिकारियों के जिम्मे हैं। इन पांचों थानों को अपराध के साथ-साथ हादसे के मामले में भी बेहद संवेदनशील माना जाताहै। कोयलांचल व बीहड़ इलाके में स्थित होने के कारण धाना क्षेत्र में हत्या, लूट डकैती, अनाचार जैसी गंभीर वारदात घटित होती है। इन मामलों को प्रभारी सुलझाने का प्रयास तो करते हैं, लेकिन उन्हें निरीक्षक अथवा उससे ऊपर रैंक के अधिकारियों के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। कई बार फरियादी धाने के बड़े अधिकारी से न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं उन्हें थाने में निरीक्षक नहीं होने

की जानकारी मिलती है। उन्हें निराशा हाथ लगती है। वे अपनी फरियाद लेकर जिला न पुलिस मुख्यालय पहुंचते हैं। तब कहीं जाकर न्याय की उम्मीद दिखाई देती है। अ गौरतलब है कि आने वाले दिनों में स विधानसभा चुनाव संपन्न कराया जाना है। ऐसे में निरीक्षक रैंक के अधिकारियों की के थानों में तैनाती जरूरी होगी। जबकि स वर्तमान में तीन निरीक्षक ही पुलिस लाइन घ में मौजूद हैं।
