“मेरी पहली विधानसभा में सत्ता दल के नेता अजीत जोगी चुन लिए गए। भाजपा विधायकों में बेहद निराशा थी। केन्द्र की भाजपा सरकार ने राज्य बनाया और सरकार कांग्रेस की बन गई। इसी निराशा के बीच बात आई कि विधानसभा में भाजपा विधायक दल का नेता कौन हो? नेता प्रतिपक्ष ताकतवर पद होता है। लिहाजा भाजपा में इसके लिए जोड़-तोड़ शुरू हुई।
छत्तीसगढ़ बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने यहां लखीराम अग्रवाल को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया था। लखीराम अग्रवाल रायगढ़ जिले के खरसिया के उद्योगपति थे। वे जनसंघ के जमाने से पार्टी में थे। उस समय लखीराम भाजपा संगठन में ताकतवर नेता थे। प्रदेश भाजपा के अधिकांश बड़े निर्णय उनकी सलाह और इच्छा से होते थे।
नेता प्रतिपक्ष चुनने के लिए रायपुर के एकात्म परिसर में भाजपा दल की बैठक आयोजित की गई। इस बैठक के लिए भाजपा हाई कमान ने अपने वरिष्ठ नेता नरेन्द्र मोदी को पर्यवेक्षक के रूप में भेजा। लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में जो अयोध्या रथ यात्रा निकली थी उसके प्रमुख संयोजक के रूप में नरेन्द्र मोदी तब नाम कमा चुके थे। नरेन्द्र मोदी बाद में गुजरात के मुख्यमंत्री बने और इस समय भारत के प्रधानमंत्री हैं।
लखीराम अग्रवाल ने विधायक दल के नेता के लिए अपने करीबी और प्रदेश के वरिष्ठ आदिवासी नेता नंद कुमार साय का नाम आगे बढ़ा दिया। संगठन ने भी यह सोचा कि आदिवासी मुख्यमंत्री के सामने वरिष्ठ आदिवासी नेता प्रतिपक्ष कहीं अधिक सफल होगा। भाजपा यह भी संदेश देना चाहती थी कि अजीत जोगी के आदिवासी होने में संदेह है, जबकि नंद कुमार साय पूर्ण रूप से जाने-माने और प्रतिष्ठित आदिवासी नेता हैं। साय उस समय रायगढ़ जिले के ‘तपकरा’ से विधायक थे और वे मध्यप्रदेश में भाजपा के अध्यक्ष रह चुके थे।
उधर ज्यादातर भाजपा विधायकों को यह लगता था कि जोगी सरकार को कमजोर कर हटाया जा सकता है, और इसलिए वे किसी सक्रिय, सक्षम और धारदार विधायक को अपना नेता चुनना चाहते थे। ऐसी स्थिति में बृजमोहन अग्रवाल का नाम विधायकों के बीच चल पड़ा। बृजमोहन अग्रवाल कूटनीतिक चालों में माहिर माने जाते हैं। वे मध्यप्रदेश में मंत्री रह चुके थे। पार्टी के अंदर उनकी अपनी अलग ताकत थी। उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाना मतलब पार्टी में एक और ताकतवर खेमा खड़ा करना था, लिहाजा लखीराम अग्रवाल उनके नाम पर राजी नहीं हुए।
अंततः लखीराम अग्रवाल के दबाव में नरेन्द्र मोदी ने नंद कुमार साय को भाजपा विधायक दल का नेता घोषित कर दिया। इस घोषणा के साथ ही विधायक दल की बैठक में हंगामा मच गया। बृजमोहन अग्रवाल के समर्थक भाजपा कार्यालय के बाहर एकत्र थे। इन कार्यकर्ताओं ने फैसला सुनते ही नारे बाजी शुरू कर दी। यह आक्रोश इतना बढ़ा कि भीड़ ने कार्यालय के अंदर तोड़फोड़ और बाहर पत्थरबाजी शुरू कर दी। नाराज कार्यकर्ताओं ने अंदर बैठे नेताओं से झूमा-झटकी भी की। नरेन्द्र मोदी पर हमला करने की कोशिश की। किसी तरह मोदी ने छिपकर खुद को बचाया। हंगामा इतना बढ़ा कि लखीराम अग्रवाल की कार को जला दिया गया। हिंसा के बीच पहुंची पुलिस और कुछ भाजपा नेताओं ने स्थिति संभाली।
खैर, नंद कुमार साय, नेता प्रतिपक्ष घोषित हो ही गए और बृजमोहन अग्रवाल को अनुशासनहीनता के आरोप में भाजपा से निलंबित कर दिया गया। उनकी सदस्यता एक साल बाद बहाल की गई।
उधर इस स्थिति को भांप कर मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने अपने आप को कांग्रेस पार्टी और विधानसभा में ज्यादा मजबूत करने के लिए कुछ असाधारण कदम उठाए।
