कोरबा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्राशाही चरम पर — फर्जी हाजिरी, लापरवाही और मरीजों की जान से खुला खिलवाड़!
कोरबा। जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज सह जिला चिकित्सालय कोरबा इन दिनों व्यवस्थाओं के नाम पर मजाक बनकर रह गया है। मरीज मरें या तड़पें, जिम्मेदार अपनी आरामतलबी और स्टॉफ अपनी मनमानी में मशगूल है। ताजा मामला तो और शर्मसार करने वाला है। एक स्टॉफ नर्स ने बिना अस्पताल आए लगातार तीन दिन बायोमेट्रिक हाजिरी लगा दी, वेतन भी बनवा लिया और किसी जिम्मेदार को इसकी भनक तक नहीं लगी।
सूत्रों के मुताबिक, यह फर्जीवाड़ा 29, 30 और 31 मार्च का है। हद तो तब हो गई जब शिकायत के बाद गोपनीय जांच में इसका खुलासा हुआ। बताया जाता है कि क्लोन फिंगरप्रिंट या सेटिंग के जरिए बायोमेट्रिक मशीन में हाजिरी दर्ज कराई गई थी। जब ड्यूटी रोस्टर और वार्ड के रिकॉर्ड से मिलान हुआ तो हकीकत सामने आई — स्टॉफ नर्स उन दिनों अस्पताल आई ही नहीं थी। सबको मालूम है कि अस्पताल के पास कैमरे में केवल 7 दिन का ही बैकअप रहता है ऐसे में मामला सामने आने तक फूटेज ही डिलीट हो जाएगा।
कई बार पकड़ी गई, फिर भी कार्रवाई शून्य
पुख्ता सूत्र बताते हैं कि यह वही स्टॉफ नर्स है, जो आए दिन ड्यूटी से गायब रहती है। मरीजों की जान को खतरे में डालती है, लेकिन अस्पताल प्रबंधन हर बार केवल चेतावनी देकर मामले को रफा-दफा कर देता है। 19 अप्रैल को भी इसी नर्स की लापरवाही के चलते एक मरीज की जान पर बन आई थी। मरीज की हालत गंभीर थी, लेकिन ये स्टॉफ नर्स तय समय पर ड्यूटी पर नहीं आई। वो तो भला हो उस डॉक्टर का जिसने समय पर पहुंचकर मरीज की जान बचा ली और पूरे मामले का खुलासा ऑफिशियल ग्रुप में कर दिया। हालांकि उच्च पदस्थ अधिकारी से खुलासा करने को लेकर डॉक्टर को डांट भी सुननी पड़ी लेकिन उसने साफ कह दिया — मेरा फर्ज था सच्चाई सामने लाना। उस दिन भी नर्स को कारण बताओ नोटिस का ड्रामा हुआ, मगर कार्रवाई फिर नदारद।
मैट्रन की मनमानी, वार्ड छोड़ VIP चेंबर में आराम
इधर मेडिकल कॉलेज अस्पताल की मैट्रन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। अस्पताली सूत्रों के मुताबिक, मैट्रन की जिम्मेदारी है कि स्टॉफ नर्स की ड्यूटी और अवकाश की निगरानी करे, लेकिन ये खुद अपनी ड्यूटी से लापता रहती है। जानकारी के मुताबिक, मैट्रन अस्पताल परिसर में स्टॉफ क्वार्टर में रहने के बावजूद समय पर अस्पताल नहीं आती। सुबह पहुंचती है तो सीधे अपने VIP चेंबर में बैठ जाती है। दिन के 3-4 घंटे वहीं बिताने के बाद दोपहर 2 से ढाई बजे घर निकल जाती है। न मरीजों का हाल पूछना, न वार्ड का निरीक्षण, न ड्यूटी की मॉनिटरिंग — सब भगवान भरोसे।
सुप्रीटेंडेंट साहब टेंडरबाजी में व्यस्त
अस्पताल की व्यवस्थाओं का असली जिम्मा जिनके कंधों पर होना चाहिए, वही सबसे ज्यादा गैरजिम्मेदार। मेडिकल सुप्रीटेंडेंट दो मंजिला ट्रामा सेंटर बिल्डिंग के अपने आलीशान ऑफिस में दिनभर फाइलें और टेंडर चेक करते हैं। अस्पताल में मरीजों की दशा-दुर्दशा से उन्हें कोई लेना-देना नहीं। न OPD का निरीक्षण, न इमरजेंसी का जायजा। सूत्र बताते हैं कि सुप्रीटेंडेंट साहब को अस्पताल के अंदर शायद ही किसी ने घूमते देखा होगा। प्रभारी सहायक अस्पताल अधीक्षक के भरोसे अस्पताल की जिम्मेदारी है। उनसे जितना बनता है, वो सुधार कराते हैं, लेकिन सहायक प्राध्यापक कैसे दमदारी दिखाए, यह भी बड़ा सवाल है।
अस्पताल में मनमानी का अड्डा
अस्पताल में स्टॉफ नर्स, वार्ड बॉय और कई संविदा कर्मी मनमानी पर उतर आए हैं। कभी मरीजों को समय पर दवा नहीं मिलती, कभी डॉक्टर गायब रहते हैं, तो जेनरिक की जगह ब्रांडेड दवाइयां सील लगाकर लिखी जा रही हैं। रात के वक्त कई बार ऐसा भी होता है कि इमरजेंसी में पहुंचने के बाद मरीज तड़पते रहते हैं, और स्टॉफ नर्स को ढूंढ़ा जा रहा होता है। शिकायतों का अंबार है, लेकिन कार्रवाई का रिकॉर्ड जीरो। सूत्र कहते हैं अब तक 50 से अधिक जांच हुई है, लेकिन कार्रवाई शून्य है।
हर शिकायत के बाद वही पुराना राग
हर बार कोई मामला सामने आता है, तो जांच का नाटक, कारण बताओ नोटिस, और फिर वही ढाक के तीन पात। न तो किसी को निलंबित किया जाता है, न FIR। यही वजह है कि स्टॉफ के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि अब बिना ड्यूटी आए भी हाजिरी लगा रहे हैं।
अब तक क्यों नहीं टूटी जिम्मेदारों की नींद?
सबसे बड़ा सवाल ये है कि इस तरह के गंभीर मामले सामने आने के बाद भी मैट्रन, स्टॉफ नर्स और सुप्रीटेंडेंट पर अब तक कोई सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या मरीजों की जान की कीमत इतनी सस्ती हो गई है कि अस्पताल प्रबंधन उसे लेकर कतई गंभीर नहीं ?
सामाजिक संगठनों का फूटा गुस्सा
इस मामले के सामने आने के बाद सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि दोषी स्टॉफ नर्स को तत्काल बर्खास्त कर, मैट्रन और सुप्रीटेंडेंट को भी जवाबदेह बनाया जाए। वरना आने वाले दिनों में कोई बड़ा हादसा हो सकता है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि मेडिकल कॉलेज अस्पताल कोरबा में अब बड़े प्रशासनिक सुधार की जरूरत है। वरना इस तरह की लापरवाही से कभी भी कोई गंभीर हादसा हो सकता है।
फिलहाल देखना ये है कि इस बड़े खुलासे के बाद जिम्मेदार कब जागते हैं, या फिर ये मामला भी पुराने मामलों की तरह फाइलों में दफन हो जाएगा।
एक बार फिर सवाल वही — मरीजों की जान कब तक यूं ही सिस्टम की लापरवाही की भेंट चढ़ती रहेगी?
