‘आबकारी’ नाम पर बवाल : पीआरओ के पेट में क्यों हो रहा दर्द ? नशेड़ी गया जेल…

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कोरबा | विशेष जांच रिपोर्ट

कोरबा में नशे में वाहन चलाने के एक मामले ने अब प्रशासनिक दावों और विभागीय खंडन के बीच बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। एक तरफ पुलिस का कहना है कि पकड़ा गया आरोपी खुद को आबकारी विभाग का ड्राइवर बता रहा था, वहीं दूसरी तरफ आबकारी विभाग ने इस पूरे मामले से साफ पल्ला झाड़ते हुए खबर को भ्रामक करार दिया है।

मामला कोतवाली थाना क्षेत्र के मानिकपुर पुलिस सहायता केंद्र का है, जहां चेकिंग के दौरान एक वाहन चालक को रैश ड्राइविंग करते रोका गया। जांच में चालक आकाश यादव नशे की हालत में पाया गया और बाद में उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

पुलिस का स्पष्ट पक्ष – “खुद को आबकारी ड्राइवर बता रहा था”

सीएसपी प्रतीक चतुर्वेदी के अनुसार, कार्रवाई के दौरान आरोपी ने पूछताछ में खुद को आबकारी विभाग से जुड़ा बताया। यह बयान केस की शुरुआत में ही सामने आया, जिसने पूरे घटनाक्रम को संवेदनशील बना दिया।

आबकारी विभाग की सफाई – “न वाहन हमारा, न चालक”

मामले के सामने आने के बाद जिला आबकारी अधिकारी आशा सिंह और जनसंपर्क अधिकारी सहायक संचालक कमल ज्योति की ओर से स्पष्टीकरण जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि इस नाम का कोई चालक विभाग में कार्यरत नहीं है और संबंधित वाहन भी विभाग का नहीं है।

यहीं से विवाद गहराने लगा। सवाल यह उठने लगे कि आखिर पुलिस के सामने आरोपी ऐसा दावा क्यों करेगा, और यदि वाहन व चालक दोनों ही विभाग से संबंधित नहीं हैं, तो फिर “छत्तीसगढ़ शासन” अंकित वाहन सड़क पर किस हैसियत से दौड़ रहा था ? क्या वो किसी दूसरे जिले का है या फिर आबकारी कोरबा में कोई निजी वाहन ही नहीं है ?

CG 13 UE 0373 : गाड़ी पर सबसे बड़ा सवाल

इस मामले का सबसे अहम बिंदु बनकर सामने आया है वाहन नंबर CG 13 UE 0373। जानकारी के अनुसार, इस वाहन पर “छत्तीसगढ़ शासन” लिखा हुआ देखा गया, जिसने मामले को और गंभीर बना दिया है।

यदि यह वाहन विभाग का नहीं है, तो —

  • क्या किसी निजी व्यक्ति द्वारा सरकारी पहचान का उपयोग किया जा रहा है ?
  • क्या यह किसी अन्य जिले या विभाग से जुड़ा वाहन है ?
  • या फिर यह केवल नाम का दुरुपयोग कर “प्रभाव” बनाने की कोशिश है ?

निजी वाहन और ड्राइवर का एंगल भी चर्चा में

प्रशासनिक कार्यों में कई बार निजी वाहनों और ड्राइवरों के उपयोग की चर्चा पहले भी सामने आती रही है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह मामला किसी अनौपचारिक व्यवस्था का हिस्सा तो नहीं, जहां सरकारी पहचान का अप्रत्यक्ष उपयोग किया जा रहा हो। हालांकि, इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

पीआरओ कमल की व्हाट्सएप मैसेज और सफाई की टाइमिंग पर सवाल

इस पूरे मामले के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, विशेषकर व्हाट्सएप पर, कुछ संदेश तेजी से प्रसारित किए जा रहे हैं जिनमें खबर को भ्रामक बताया जा रहा है। इन संदेशों में आबकारी विभाग का पक्ष प्रमुखता से साझा किया जा रहा है। इसका सूत्रधार पीआरओ कमलज्योति जाहिरे बताया रहा है जो मीडिया ग्रुप में ख़बर को साझा कर रहा है। वहीं एक चाटूकार कथित पत्रकार ब्रॉडकास्ट के जरिये उसको व्हाट्सएप्प में शेयर कर रहा है। लेकिन द वॉइस न्यूज़ के पास पूरे पुख्ता सबूत मौजूद है।

यहां एक और सवाल उठता है—क्या यह केवल तथ्यात्मक स्पष्टीकरण है या फिर खबर सामने आते ही छवि प्रबंधन (image management) की कोशिश? यह स्पष्ट होना अभी बाकी है।

जवाबदेही बनाम दावे—सच क्या है?

पूरा मामला अब केवल एक ड्राइवर की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही, पहचान के उपयोग और पारदर्शिता से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।

मुख्य सवाल अब भी कायम हैं—

  • क्या आरोपी ने गलत जानकारी दी या किसी पहचान का दुरुपयोग किया ?
  • CG 13 UE 0373 वाहन की वास्तविक स्थिति क्या है ?
  • आबकारी विभाग व पीआरओ कमल ज्योति का खंडन पूरी तरह तथ्यात्मक है या जांच का विषय ?

जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने नहीं आते, तब तक यह मामला संदेह और चर्चा के घेरे में बना रहेगा।

फिलहाल, एक बात साफ है—कोरबा का यह मामला अब सिर्फ “नशे में ड्राइविंग” नहीं, बल्कि “पहचान, जिम्मेदारी और सच्चाई” की पड़ताल बन चुका है।

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