*विशेष रिपोर्ट: औद्योगिक नगरी कोरबा में ‘सांसों पर संकट’ और ‘पेट की आग’ के बीच पिसता आम आदमी*

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कोरबा: छत्तीसगढ़ की ऊर्जा धानी कोरबा से पिछले कुछ दिनों में दो ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जो शहर के विकास और जमीनी हकीकत के बीच के बड़े अंतर को उजागर करती हैं। एक तरफ जहां अवैध राखड़ डंपिंग से पर्यावरण का दम घुट रहा है, वहीं दूसरी ओर गरीबी का आलम यह है कि महिलाएं दो वक्त के चूल्हे के लिए अपनी जान दांव पर लगा रही हैं।

1. मौत को दावत देती मजबूरी (सर्वमंगला फाटक का दृश्य)
सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में देखा जा सकता है कि सर्वमंगला फाटक के पास एक महिला चलती मालगाड़ी से डंडे के सहारे कोयला नीचे गिरा रही है। अगल-बगल से गुजरती ट्रेनों और मालगाड़ी के पहियों के बीच यह जानलेवा खेल सिर्फ इसलिए खेला जा रहा है ताकि घर का चूल्हा जल सके। यह तस्वीर प्रशासन के उन दावों पर सवाल उठाती है जहाँ हर गरीब तक बुनियादी सुविधाएं पहुँचाने की बात कही जाती है।

 

2. राख के ढेर में दबती सांसें (तुलसी नगर बाईपास)
दूसरी ओर, पर्यावरण कार्यकर्ता मेघा चौहान ने एक वीडियो जारी कर कोरबा में बेतहाशा बढ़ रहे प्रदूषण और अवैध राखड़ डंपिंग की ओर ध्यान खींचा है। तुलसी नगर और सर्वमंगला मंदिर के पास बाईपास रोड पर भारी मात्रा में राखड़ (Fly Ash) डंप किया जा रहा है। आरोप है कि भू-माफिया अतिक्रमण करने की नीयत से या डंपिंग शुल्क बचाने के लिए शहर के रिहायशी इलाकों और खाली जमीनों को राख से पाट रहे हैं। इससे न केवल जमीन बंजर हो रही है, बल्कि हवा में उड़ती राख लोगों की सेहत के लिए गंभीर खतरा बन गई है।
जनता की मांग और प्रशासनिक मौन
इन दोनों मामलों में एक बात सामान्य है—आम जनता की सुरक्षा और स्वास्थ्य की अनदेखी। जहाँ एक ओर रेलवे ट्रैक पर सुरक्षा का अभाव है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिला कलेक्टर और संबंधित विभाग से तत्काल कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
सवाल ??

क्या कोरबा का विकास केवल उद्योगों और उत्पादन तक सीमित रहेगा, या यहाँ के नागरिकों को सुरक्षित वातावरण और सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार भी मिलेगा? यह सवाल आज हर कोरबा वासी पूछ रहा है।

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