
कोरबा: नगर पालिक निगम कोरबा में इन दिनों विकास का एक ऐसा ‘अनोखा मॉडल’ देखने को मिल रहा है, जिसे देखकर इंजीनियर भी अपना सिर पकड़ लें। मामला शहर के व्यस्ततम साप्ताहिक बुधवारी बाजार क्षेत्र का है, जहाँ निगम ने पहले अपने ही खर्च पर 5 दुकानों का निर्माण कराया, दीवारें खड़ी कीं और फिर अचानक उन्हें मलबे में तब्दील कर दिया。

पहले बनाया ‘ट्रेलर’, अब दिखाएंगे ‘असली फिल्म’!
हैरानी की बात यह है कि दुकानों को तोड़ने के पीछे निगम का तर्क और भी दिलचस्प है। बताया जा रहा है कि अब यहाँ लेंटर डालकर नए सिरे से निर्माण किया जाएगा。 सवाल यह उठता है कि जब अंत में लेंटर ही डालना था, तो शुरुआती प्लानिंग में यह बात क्यों शामिल नहीं थी? क्या निगम पहले ‘डेमो वर्जन’ बनाकर चेक कर रहा था और अब ‘अपडेटेड वर्जन’ लाने की तैयारी है?

900 करोड़ का बजट और ‘गोल-गोल’ विकास
चर्चा है कि नगर निगम के पास इस वर्ष लगभग 900 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट है。 शायद बजट इतना ज्यादा है कि उसे ठिकाने लगाने के लिए ‘बनाओ-तोड़ो-फिर बनाओ’ वाली नीति अपनाई जा रही है。 स्थानीय लोगों का कहना है कि यह विकास कम और सरकारी पैसे का ‘अभ्यास’ ज्यादा लग रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में जो जनता का पैसा मलबे में मिला, उसका जिम्मेदार कौन है?

जनता पूछ रही—कौन है इस ‘मास्टरमाइंड’ प्लानिंग का जनक?
अतिक्रमण हटाने के बाद जिन लोगों को व्यवस्थापन के तहत ये दुकानें मिलनी हैं, वे अब भी कतार में खड़े होकर तमाशा देख रहे हैं。 जनता के बीच अब यह सवाल गूंज रहा है:
क्या यह किसी नई शहरी नीति का हिस्सा है या फिर प्लानिंग फेल्योर का जीता-जागता नमूना?

क्या फाइलों का वजन बढ़ाने के लिए जानबूझकर निर्माण और ध्वंस का यह चक्र चलाया जा रहा है?
इस ‘प्रयोग’ में बर्बाद हुए सार्वजनिक धन की भरपाई कौन करेगा?
निष्कर्ष: फिलहाल बुधवारी बाजार में विकास की गूंज से ज्यादा बुलडोजर का शोर सुनाई दे रहा है。 उम्मीद है कि अगली बार निगम की योजनाएं जमीन पर उतरने से पहले कागज पर थोड़ी और मजबूत बनेंगी, ताकि उसे बार-बार तोड़ने की नौबत न आए。
