कोरबा शहर इन दिनों पेट्रोल संकट, लंबी लाइनों और बंद पड़े पेट्रोल पंपों से जूझ रहा है। आम आदमी अपनी बाइक में दो लीटर पेट्रोल डलवाने के लिए घंटों लाइन में खड़ा है। कोई ऑफिस देर से पहुंच रहा है, कोई बच्चों को स्कूल छोड़ने की चिंता में परेशान है। लेकिन इसी शहर के नगर पालिक निगम परिसर में एक अलग ही दुनिया चल रही है — यहां सरकारी तेल पर “ठंडी हवा” का राज कायम है।
नगर निगम में सरकारी संसाधनों के कथित दुरुपयोग की तस्वीर तब सामने आई जब हमारी टीम निगम परिसर पहुंची। वहां का नजारा चौंकाने वाला था। दर्जनभर से अधिक सरकारी गाड़ियां परिसर में खड़ी थीं, लेकिन सिर्फ खड़ी नहीं — अधिकांश गाड़ियां चालू हालत में थीं और उनके एसी चल रहे थे।
जब कर्मचारियों और ड्राइवरों से पूछा गया कि आखिर इतनी देर से गाड़ियां चालू क्यों रखी गई हैं, तो जवाब मिला —
“साहब को गर्मी से नफरत है… गाड़ी पहले से ठंडी रखना पड़ता है।”
बस यही एक वाक्य पूरे सिस्टम की कहानी बयान करने के लिए काफी था।
जनता लाइन में, अफसर ठंडी हवा में
एक तरफ शहर के कई पेट्रोल पंपों में ताले लटके हुए हैं। जहां पेट्रोल मिल भी रहा है, वहां सुबह से लंबी कतारें लगी हैं। लोग अपने काम छोड़कर ईंधन के इंतजार में खड़े हैं।
दूसरी तरफ निगम परिसर में सरकारी तेल जलाकर गाड़ियों को पहले से चालू रखने का कथित “कल्चर” सवालों के घेरे में है। सूत्र बताते हैं कि कुछ अधिकारियों के लिए ड्राइवरों को पहले ही निर्देश दे दिए जाते हैं कि गाड़ी समय से पहले स्टार्ट कर एसी ऑन रखा जाए ताकि अधिकारी जब बैठें तो उन्हें गर्मी का एहसास तक न हो।
“जनता धूप में पसीना बहाए… और साहब ठंडी हवा में सफर करें ?”
आयुक्त स्कूटी पर, अफसरों को SUV का मोह
सबसे दिलचस्प बात यह है कि नगर निगम आयुक्त आशुतोष पाण्डेय खुद कई बार इलेक्ट्रिक स्कूटी से दफ्तर और निरीक्षण पर जाते दिखाई देते हैं। शहर में उनकी इस सादगी की चर्चा भी होती रही है।
लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि जब विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी ई-स्कूटी से काम चला सकता है, तब बाकी अधिकारियों को सरकारी गाड़ियों और एसी वाली सुविधा से इतना मोह क्यों ?
भाजपा और कांग्रेस पार्षद भी भड़के
मामले को लेकर अब राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आने लगी है। भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के कई पार्षदों ने सरकारी धन और ईंधन के कथित दुरुपयोग पर नाराज़गी जताई है।
कुछ पार्षदों का कहना है कि निगम को पहले खुद उदाहरण पेश करना चाहिए। जब शहर में पेट्रोल संकट हो, तब सरकारी गाड़ियों को बेवजह चालू रखना जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।
“लगता है निगम में एसी पहले चालू होता है और काम बाद में।”
सरकारी तेल है… इसलिए फिक्र नहीं ?
सबसे बड़ा सवाल मानसिकता पर उठ रहा है। क्योंकि जिस ईंधन के लिए आम आदमी अपनी जेब ढीली करता है, वही ईंधन जब सरकारी गाड़ी में जाता है तो उसकी कीमत का एहसास शायद खत्म हो जाता है।
सरकारी वाहन आखिर जनता के टैक्स के पैसे से चलते हैं। ऐसे में यदि गाड़ियां सिर्फ इसलिए चालू रखी जाएं कि अधिकारी को बैठते ही “कूल-कूल” माहौल मिले, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि सरकारी संसाधनों के प्रति असंवेदनशीलता भी मानी जाएगी।
प्रधानमंत्री सादगी की बात कर रहे, यहां चल रहा उल्टा मॉडल
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार सरकारी खर्च कम करने, संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग और सादगी की बात कर रहे हैं। कई सरकारी विभागों में ईंधन बचाने और अनावश्यक खर्च रोकने के निर्देश दिए गए हैं।
लेकिन कोरबा नगर निगम की तस्वीर इन संदेशों के बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। यहां ऐसा लगता है मानो “सरकारी तेल” का मतलब “असीमित सुविधा” हो गया हो।
अब जनता पूछ रही…
- क्या सरकारी वाहनों के उपयोग की जांच होगी ?
- क्या अफसरों की “ठंडी हवा” के लिए जनता का टैक्स इसी तरह जलता रहेगा ?
“जनता पेट्रोल के लिए लाइन में है…
और साहब को गर्मी से नफरत है!”
