
आउटर में चालानी कार्रवाई का ‘मोर्चा’ मजबूत, लेकिन टीपी नगर से इमलीडुग्गु तक जनता जाम में फंसी—नो एंट्री खुलते ही व्यवस्था क्यों हो जाती है बेपटरी ?
कोरबा। शहर की यातायात व्यवस्था को देखकर एक सवाल बार-बार उठ रहा है—क्या यातायात पुलिस का काम सिर्फ चालान काटना रह गया है ? क्योंकि एक तरफ आउटर में यातायात अमला चालानी कार्रवाई में व्यस्त नजर आता है, वहीं दूसरी तरफ शहर के भीतर नो एंट्री खत्म होते ही सड़कें जाम से कराहने लगती हैं।
शनिवार रात टीपी नगर से इमलीडुग्गु तक का नजारा इसी व्यवस्था की पोल खोलता नजर आया। नो एंट्री खत्म होते ही भारी वाहन सड़क पर उतर आए। देखते ही देखते वाहनों की लंबी कतार लग गई। कहीं वाहन आड़े-तिरछे खड़े थे तो कहीं छोटे वाहन और बाइक सवार भारी वाहनों के बीच रास्ता तलाशते नजर आए।
50 से ज्यादा जवानों का अमला आखिर कहां है ?
बताया जाता है कि यातायात व्यवस्था के लिए 50 से अधिक जवानों का अमला मौजूद है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि इतनी बड़ी संख्या में जवानों की तैनाती के बावजूद शहर के प्रमुख मार्गों पर जाम क्यों लगता है ?
अगर नो एंट्री खत्म होने का समय पहले से निर्धारित है और यह भी पता है कि उस समय भारी वाहनों का दबाव अचानक बढ़ेगा, तो फिर उस समय प्रमुख पॉइंट पर यातायात जवान क्यों नहीं दिखाई देते ? क्या ट्रैफिक पुलिस को पहले से पता नहीं कि किस समय कहां जाम लग सकता है ?
आउटर में चालान, शहर में जाम—प्राथमिकता आखिर क्या है ?
चालानी कार्रवाई निश्चित तौर पर यातायात व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन सवाल प्राथमिकता का है। अगर आउटर में कार्रवाई के लिए अमला आसानी से उपलब्ध है, तो शहर के भीतर जाम खुलवाने और यातायात नियंत्रित करने के लिए वही अमला क्यों नजर नहीं आता ?
आम आदमी का सवाल बेहद सीधा है—चालान काटने के लिए पुलिस चाहिए तो जाम खुलवाने के लिए कौन आएगा ?
ट्रेन यात्री भी फंस रहे, हादसे का खतरा भी
देर रात यात्री ट्रेन से उतरने वाले लोगों को सेकेंड एंट्री और मानिकपुर बाईपास की ओर जाने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। भारी वाहनों की कतार और अंधेरे के बीच पैदल राहगीरों तथा दोपहिया वाहन चालकों के लिए स्थिति बेहद जोखिम भरी हो जाती है।
ऐसे में सवाल सिर्फ जाम का नहीं है। सवाल यह है कि अगर इसी अव्यवस्था के बीच कोई गंभीर हादसा हो गया तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
DSP मैडम, जनता को जवाब चाहिए
यातायात विभाग से सवाल है कि जब फोर्स की कमी नहीं है, नो एंट्री का समय तय है और जाम वाले पॉइंट भी किसी से छिपे नहीं हैं, तो फिर व्यवस्था सुधारने में आखिर दिक्कत कहां है ?
आउटर में चालान की गिनती बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है कि शहर के भीतर यातायात सुचारू रहे। जनता को चालान से ज्यादा सुरक्षित और व्यवस्थित सड़क चाहिए।
DSP मैडम, 50 से ज्यादा जवानों के रहते अगर टीपी नगर से इमलीडुग्गु तक रोज जाम लग रहा है, तो सवाल जवानों की संख्या का नहीं, उनकी तैनाती और निगरानी की व्यवस्था का है।
अब देखना यह है कि यातायात विभाग इस सवाल का जवाब जाम खुलवाकर देता है या फिर एक और दिन शहर को जाम में छोड़कर।
