*जेल की जगह अस्पताल में ‘वीआईपी ट्रीटमेंट’ ! कोर्ट के आदेश के बावजूद 6 दिन तक अलग कमरे में ऐश करता रहा बंदी, कैमरे में मोबाइल चलाते पकड़ा गया*

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कोरबा के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक व्यवस्था और बंदियों के इलाज से जुड़े नियमों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चेक बाउंसिंग मामले में न्यायालय द्वारा जेल भेजे जाने का आदेश मिलने के बावजूद आरोपी अपूर्व वासन करीब छह दिनों तक अस्पताल में आराम फरमाता रहा। हैरानी की बात यह है कि आरोपी को अस्पताल में बाकायदा अलग कमरा उपलब्ध कराया गया था और वह पुलिसकर्मी की मौजूदगी में मोबाइल फोन चलाते हुए भी कैमरे में कैद हो गया।
सूत्रों के अनुसार आरोपी को 6 मार्च को मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जबकि न्यायालय के निर्देश के मुताबिक उसे सीधे जेल में दाखिल कराया जाना था। इसके बावजूद अस्पताल में उसे ऐसी सुविधाएं दी गईं मानो वह कोई वीआईपी मरीज हो। नियमों के अनुसार सामान्य बीमारी की स्थिति में बंदियों को अस्पताल के जनरल वार्ड में भर्ती किया जाता है और गंभीर स्थिति होने पर ही आईसीयू में रखा जाता है। लेकिन इस मामले में आरोपी को न तो आईसीयू में भर्ती किया गया और न ही जनरल वार्ड में, बल्कि अलग कमरे की व्यवस्था कर दी गई।


इस दौरान आरोपी अस्पताल परिसर में घूमता-फिरता भी रहा और पुलिसकर्मी के सामने मोबाइल चलाता हुआ नजर आया, जिसका वीडियो मीडिया के कैमरे में कैद हो गया। पूरे घटनाक्रम के सामने आने के बाद अस्पताल प्रबंधन में हड़कंप मच गया और आनन-फानन में आरोपी को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया।
चौंकाने वाली बात यह भी है कि जिला जेल प्रबंधन को ऐसे किसी बंदी के अस्पताल में भर्ती होने या जेल भेजे जाने की सूचना तक नहीं दी गई थी। इस संबंध में मेडिकल कॉलेज अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. गोपाल कंवर ने पूरे मामले की जांच कराने की बात कही है।
वहीं अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक लखन पटले ने बताया कि आरोपी को अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद जेल में दाखिल करा दिया गया है। सूत्रों का यह भी कहना है कि इस दौरान आरोपी को न्यायालय से जमानत मिल चुकी थी, लेकिन नियमों के अनुसार बिना जेल में आमद कराए जमानत की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती थी। ऐसे में आनन-फानन में पहले उसे जेल में दाखिल कराया गया ताकि जमानत की औपचारिक प्रक्रिया पूरी हो सके।
इधर जिला जेल अधीक्षक ने इस पूरे मामले की जानकारी अपने वरीय अधिकारियों और संबंधित न्यायालय को भेज दी है। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर किसके दबाव या रसूख के दम पर एक बंदी ने अस्पताल को छह दिनों तक आरामगाह बना रखा था और क्या इस मामले में जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी।

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