
कोरबा। जिला मेडिकल कॉलेज में पिछले कुछ दिनों से व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। मरीजों और उनके परिजनों की शिकायत है कि डॉक्टरों और स्टाफ की कमी का सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। वहीं अस्पताल में कार्यरत कुछ डॉक्टर और कर्मचारी भी पर्याप्त मानव संसाधन नहीं होने की बात कह रहे हैं।
बताया जा रहा है कि मेडिकल कॉलेज में कई जगह डॉक्टरों के साथ पर्याप्त संख्या में स्टाफ उपलब्ध नहीं है। कर्मचारियों का कहना है कि काम का दबाव लगातार बढ़ रहा है और सीमित स्टाफ में ड्यूटी करना मुश्किल हो रहा है। दूसरी ओर डॉक्टरों के सामने भी एक साथ बड़ी संख्या में मरीजों को देखने की चुनौती बनी हुई है।
डेढ़ घंटे तक बच्चे को नहीं मिला उपचार, परिजन परेशान
व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने वाला एक मामला हाल ही में सामने आया। परिजनों के मुताबिक एक छोटे बच्चे को डॉक्टर ने दवा लिखने के साथ भर्ती किए जाने की बात कही, लेकिन इसके बाद करीब डेढ़ घंटे से अधिक समय तक बच्चे को भर्ती कराने अथवा आगे की चिकित्सा व्यवस्था करने के लिए कोई जिम्मेदार कर्मचारी सामने नहीं आया।
परिजन का आरोप है कि बच्चे की हालत को लेकर वे लगातार परेशान रहे और उसकी मां रोती रही, लेकिन समय पर उचित व्यवस्था नहीं हो सकी। अस्पताल की ओर से कथित तौर पर स्टाफ और बेड उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई।
यदि वास्तव में बेड उपलब्ध नहीं था तो मरीज को दूसरे अस्पताल में रेफर करने अथवा वैकल्पिक चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी अस्पताल प्रबंधन की बनती है। ऐसे मामलों में मरीज और उसके परिजनों को स्पष्ट जानकारी और तत्काल समाधान मिलना जरूरी है।
शिकायत करें तो किससे करें?
परिजनों का आरोप है कि अस्पताल की व्यवस्था को लेकर शिकायत करने पर भी उन्हें संतोषजनक समाधान नहीं मिल पाया। यहां तक कि जिले के वरिष्ठ अधिकारी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन कथित तौर पर फोन नहीं उठाया गया। स्वास्थ्य संबंधी शिकायत के लिए हेल्पलाइन पर संपर्क करने पर कॉल आगे स्वास्थ्य विभाग को ट्रांसफर किए जाने की जानकारी दी गई।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि गंभीर स्थिति में परेशान मरीज आखिर अपनी शिकायत लेकर जाए तो जाए कहां?
मेडिकल कॉलेज बना, लेकिन व्यवस्थाएं कब सुधरेंगी?
मेडिकल कॉलेज का उद्देश्य जिले के लोगों को बेहतर और विशेषज्ञ स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है। लेकिन यदि डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और अन्य जरूरी कर्मचारियों की कमी बनी रहती है, तो इसका सीधा असर मरीजों पर पड़ना स्वाभाविक है।
यह भी आरोप सामने आया है कि कुछ कर्मचारी पुराने जिला अस्पताल परिसर से ही अपनी ड्यूटी कर रहे हैं, जबकि मेडिकल कॉलेज में मानव संसाधन की जरूरत बनी हुई है। इस पूरे मामले में प्रशासन को वास्तविक स्थिति की जांच कर स्पष्ट व्यवस्था बनाने की जरूरत है।
दो एंबुलेंस के उपयोग की भी हो जांच
मेडिकल कॉलेज को स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए उपलब्ध कराई गई दो एंबुलेंस के उपयोग को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि इन वाहनों का उपयोग मरीजों की चिकित्सा सुविधा के बजाय निजी कार्यों में किया जा रहा है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। इसलिए संबंधित प्रशासन को एंबुलेंस के लॉगबुक, ड्यूटी चार्ट, ईंधन खपत और उपयोग का रिकॉर्ड सार्वजनिक अथवा जांच के दायरे में लाकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की जरूरत
छत्तीसगढ़ शासन और जिला प्रशासन द्वारा स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन योजनाओं का वास्तविक लाभ मरीजों तक पहुंच रहा है या नहीं, इसकी नियमित निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।
मेडिकल कॉलेज की मौजूदा व्यवस्थाओं की स्वतंत्र जांच, डॉक्टरों एवं स्टाफ की वास्तविक उपलब्धता, मरीजों को भर्ती करने की प्रक्रिया, रेफरल व्यवस्था और एंबुलेंस के उपयोग की जांच के लिए प्रशासन को एक विशेष टीम गठित करनी चाहिए।
मेडिकल कॉलेज केवल भवन और मशीनों से नहीं, बल्कि संवेदनशील डॉक्टरों, पर्याप्त स्टाफ और जवाबदेह व्यवस्था से चलता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि जिम्मेदार अधिकारी इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हैं या मरीजों और उनके परिजनों को इसी तरह परेशान होना पड़ेगा।

